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आईआईटी कानपुर: डिफेंस के लिए ‘मानव-केंद्रित डिजाइन’ पर कार्यशाला का हुआ आयोजन

कानपुर। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) ने एक महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया, जिसका विषय रक्षा क्षेत्र में मानव-केंद्रित डिजाइन था। कार्यक्रम में शिक्षा, रक्षा और उद्योग से जुड़े प्रमुख विशेषज्ञ शामिल हुए। यह कार्यशाला डिफेंस इनोवेशन एक्सेलेरेटर फॉर सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजीज – सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के अंतर्गत आयोजित की गई थी।

कार्यशाला की शुरुआत दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इस अवसर पर एल.सी. मंगल (डीएस और डीजीटीएम, DRDO), संजय टंडन (निदेशक, DIA–COE), प्रो. तरुण गुप्ता (डीन, रिसर्च एंड डेवलपमेंट), प्रो. सत्यकी रॉय (प्रमुख, डिज़ाइन विभाग) और एसोसिएट प्रोफेसर विवेक कांत, डिजाइन डिपार्टमेंट, आईआईटी कानपुर शामिल थे।

कार्यक्रम में संजय टंडन ने स्वागत भाषण में कहा कि, ‘मानव-केंद्रित डिजाइन सिर्फ एक सोच नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। कोई भी तकनीक तभी सफल मानी जाएगी, जब वो सैनिकों के लिए समझने में आसान, उपयोग में आसान और उनके लिए उपयोगी हो।’
DRDO के एल.सी. मंगल ने कहा कि, किसी भी रक्षा तकनीक का असली मूल्य तभी है, जब वो सैनिकों के लिए उपयोगी और सुविधाजनक हो। उन्होंने सुझाव दिया कि DRDO में मानव-केंद्रित डिजाइन पर एक अलग सेक्शन शुरू होना चाहिए और आईआईटी कानपुर को इसमें पूरा सहयोग दिया जाएगा।

प्रो. तरुण गुप्ता ने कहा, ‘हमारी रिसर्च को केवल कागज तक सीमित नहीं रहना चाहिए, उसे जमीनी स्तर पर काम करने लायक बनाना जरूरी है।’

प्रो. सत्यकी रॉय ने कहा, ‘तकनीक में इंसानियत और समझ जरूरी है। अगर हम सिर्फ मशीन पर ध्यान दें और सैनिकों की ज़रूरत न समझें, तो तकनीक फेल हो सकती है।’

प्रो. विवेक कांत, जो इस कार्यशाला के मुख्य संयोजक थे, उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम इस सोच के साथ बनाया गया है कि कैसे हम सैनिकों की असली समस्याओं को समझें, उनका समाधान खोजें और इस दिशा में मिलकर एक रोडमैप तैयार करें। आगे उन्होंने बताया कि अकादमिक जगत, रक्षा संस्थान और उद्योग एक साथ मिलकर काम करें, तो अच्छे और टिकाऊ समाधान निकाल सकते हैं।

कार्यशाला में विंग कमांडर सिद्धार्थ सिंह (रिटायर्ड) ने भी हिस्सा लिया, जो 3,000 घंटे से ज़्यादा की उड़ान का अनुभव रखते हैं। उन्होंने बताया कि फाइटर प्लेन की कॉकपिट डिज़ाइन में क्या चुनौतियां आती हैं और कैसे एक छोटी गलती जानलेवा बन सकती है। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि डिज़ाइन इस तरह हो कि पायलट को कम से कम सोचना पड़े और चीज़ें अपने आप समझ में आएं।

इसके अलावा आईआईटी मुंबई, आईआईटी गुवाहाटी, आईआईटी इंदौर और कई अनुभवी डिज़ाइनरों ने भी हिस्सा लिया और बताया कि कैसे अच्छी डिजाइन सैनिकों के काम को आसान बना सकती है।

इस अवसर पर एक ब्रेनस्टॉर्मिंग सेशन भी हुआ जिसमें टीम ने मिलकर सोचा कि सैनिकों को क्या दिक्कतें आती हैं और उनके लिए कैसी तकनीक बनाई जा सकती है। जो सुझाव इस सेशन से आए, उन्हें एक “व्हाइट पेपर” यानी एक रिपोर्ट के रूप में तैयार किया जाएगा, जो आगे की रिसर्च और नीति निर्माण में काम आएगी।

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