मुंबई। हिंदी सिनेमा और मंचीय कला जगत ने एक ऐसी कलाकार को खो दिया है, जिसने अपनी आवाज और मिमिक्री की अनूठी कला से दशकों तक दर्शकों का मनोरंजन किया। भारत की पहली महिला मिमिक्री आर्टिस्ट के रूप में पहचानी जाने वाली आशा सिंह जायसवाल का निधन हो गया। उनके निधन से कला और मनोरंजन जगत में शोक की लहर है।
आशा सिंह जायसवाल ने उस दौर में मिमिक्री को अपना पेशा बनाया, जब महिलाओं के लिए मंच पर अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं था। उन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर न केवल मंचीय कार्यक्रमों में पहचान बनाई, बल्कि कई मशहूर हस्तियों की आवाज और अंदाज को अपनी कला के जरिए जीवंत किया। इनमें हिंदी सिनेमा की ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी की आवाज की उनकी मिमिक्री विशेष रूप से चर्चित रही।
मीना कुमारी की आवाज बनी पहचान
आशा सिंह जायसवाल की सबसे खास प्रस्तुतियों में मीना कुमारी की आवाज की नकल शामिल थी। उनकी आवाज, बोलने के अंदाज और संवाद अदायगी को इतनी बारीकी से प्रस्तुत किया जाता था कि दर्शक उनकी प्रस्तुति से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते थे। यही हुनर आगे चलकर उनकी विशिष्ट पहचान बन गया।
उन्होंने मिमिक्री को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि आवाज, संवाद और भावनाओं के जरिए किसी किरदार की मौजूदगी महसूस कराने की कला के रूप में विकसित किया।
‘महाभारत’ में भी नजर आईं
आशा सिंह जायसवाल ने टेलीविजन की दुनिया में भी काम किया। दूरदर्शन के लोकप्रिय धारावाहिक ‘महाभारत’, जिसे बीआर चोपड़ा ने बनाया था, में उन्होंने आचार्य कृपी की भूमिका निभाई थी। हालांकि धारावाहिक में उनका किरदार सीमित रहा, लेकिन इससे टेलीविजन दर्शकों के बीच भी उन्हें पहचान मिली।
उनका अधिकांश रचनात्मक सफर मंचीय कार्यक्रमों और इवेंट्स से जुड़ा रहा। उन्होंने अपनी कला को लगातार सक्रिय बनाए रखा और मनोरंजन जगत से लंबे समय तक जुड़ी रहीं।
‘आशा इवेंट्स एंड फिल्म्स’ के जरिए जारी रखा काम
आशा सिंह जायसवाल ने ‘आशा इवेंट्स एंड फिल्म्स’ के जरिए अपने काम को नया विस्तार दिया। उनके लिए काम केवल रोजी-रोटी का जरिया नहीं था, बल्कि उनकी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा था।
उनके बेटे आकाश भारद्वाज के मुताबिक, उनकी मां के लिए उनका काम ही सब कुछ था। उम्र के अंतिम दौर तक काम के प्रति उनका समर्पण उनकी पहचान बना रहा।
अंतिम संदेश भी था अलग
आशा सिंह जायसवाल की जिंदगी की तरह उनका अंतिम संदेश भी अपने भीतर एक अलग दृष्टिकोण समेटे था। उन्होंने मृत्यु को लेकर शोक के बजाय आनंद और सकारात्मकता का संदेश दिया था। उनके करीबियों के अनुसार, वह जीवन को अपनी शर्तों पर जीने और अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित रहने में विश्वास रखती थीं।
मुंबई के विले पार्ले स्थित पवन हंस श्मशान घाट पर रविवार सुबह उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके परिजनों, करीबियों और कला जगत से जुड़े लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी।
आशा सिंह जायसवाल अब मंच पर दिखाई नहीं देंगी, लेकिन उनकी आवाज की नकल, उनकी मंचीय प्रस्तुतियां और कला के प्रति उनका समर्पण लंबे समय तक याद किया जाएगा। उन्होंने उस दौर में महिलाओं के लिए मिमिक्री और मंचीय मनोरंजन के क्षेत्र में अपनी जगह बनाई, जब ऐसे पेशे में महिलाओं की मौजूदगी बेहद कम थी।
उनकी कहानी इस बात की मिसाल है कि किसी कलाकार की पहचान केवल पर्दे पर दिखाई देने वाले चेहरों से नहीं बनती। कई बार पर्दे के पीछे रहकर भी कोई कलाकार अपनी कला की ऐसी छाप छोड़ जाता है, जिसे समय मिटा नहीं पाता।

