कानपुर। छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय परिसर की राष्ट्रीय सेवा योजना की पंचम इकाई द्वारा चतुर्थ …
Read More »सम्मिलित तुझमे हो गई !
ज्योति सिंह अर्धांगनी बन तुम्हारी, मैं संगिनी हो गई साथ होकर मैं तुम्हारे, सम्मिलित तुझमे हो गई। बना सागर तुझे, मैं खुद नदिया बन गई छोड़ पर्वत जंगल, तुझसे आकर मिल गई भुला अपने गुण-अवगुण, तुम जैसी मैं हो गई साथ होकर मैं तुम्हारे, सम्मिलित तुझमे हो गई। लुटा प्रेम …
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